अमेरिकी सीनेट ने रूस पर नए प्रतिबंधों वाला विधेयक आगे बढ़ा दिया है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले भारत‑चीन जैसे देशों पर 100% तक आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का प्रावधान है, लेकिन यह अभी कानून नहीं बना है।
§बिल में क्या प्रावधान हैं?
सीनेट में पेश संशोधित प्रतिबंध विधेयक का मकसद रूस की तेल‑कमाई पर चोट करके यूक्रेन युद्ध की फंडिंग काटना है।
प्रस्तावित प्रावधान के तहत पिछले 12 महीनों में रूसी कच्चे तेल या नैचुरल गैस के टॉप‑5 खरीदार देशों से अमेरिका को होने वाले आयात पर अधिकतम 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है। इन टॉप‑5 में चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान के नाम लिए गए हैं।
पहले ड्राफ्ट में 500% तक टैरिफ का प्रस्ताव था, जिसे संशोधित बिल में घटाकर अधिकतम 100% किया गया है; यह भारत‑चीन के लिए कुछ राहत जरूर है, लेकिन खतरा बरकरार है।
भारत‑चीन पर असर का खतरा
अगर यह बिल दोनों सदनों से पास होकर राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बनता है, तो भारत और चीन से अमेरिका को जाने वाले उन सामानों पर भारी शुल्क लग सकता है जो इन देशों को रूसी तेल‑कमाई से लाभान्वित मानते हुए टारगेट किए जाएंगे।
भारतीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह टैरिफ सीधे रूसी क्रूड‑ऑयल खरीद पर नहीं, बल्कि ऐसे देशों से होने वाले अमेरिकी आयात पर लगाया जाएगा, ताकि अप्रत्यक्ष आर्थिक दबाव पैदा हो; इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है।
भारत अभी रूस से रियायती दरों पर बड़ी मात्रा में तेल खरीदकर अपने ऊर्जा‑बिल को कम रखे हुए है; इस पर अमेरिकी दबाव बढ़ने से भारत को ऊर्जा‑सुरक्षा और अमेरिका के साथ रणनीतिक‑व्यापारिक रिश्तों के बीच संतुलन और मुश्किल हो सकता है।
‘टैरिफ बम’ और ट्रंप की नीति
24 जुलाई के आसपास ट्रंप प्रशासन ने अलग से 60 देशों पर 10–12.5% के नए टैरिफ का ऐलान भी किया है, जो पुराने सेक्शन‑301 टैरिफ के एक्सपायर होते ही लागू होने हैं; इसमें भारत और चीन शामिल हैं, इसलिए मीडिया इसे ‘टैरिफ बम’ कहकर रिपोर्ट कर रहा है।
ट्रंप पहले रूस के तेल पर भारत‑चीन जैसे देशों के खिलाफ 500% टैरिफ की धमकी दे चुके थे, लेकिन कांग्रेस में सहमति बनाने के लिए उसे घटाकर 100% के स्तर पर लाया गया है; यानी पनिशमेंट टैरिफ का नेचर बरकरार है, बस दर कम हुई है।
आगे क्या संभावित परिदृश्य?
अभी यह केवल सीनेट में बिल आगे बढ़ने की स्टेज पर है; इसे फाइनल कानून बनने के लिए हाउस ऑफ रिप्रेज़ेंटेटिव्स से पास होना और राष्ट्रपति की सिग्नेचर ज़रूरी हैं, इसलिए तुरंत 100% टैरिफ लगना तय नहीं माना जा सकता।
भारत संभवतः दो ट्रैक पर चलेगा: एक तरफ रूस से डिस्काउंटेड तेल का फायदा बचाए रखने की कोशिश, दूसरी तरफ अमेरिकी लॉबींग और डिप्लोमैसी के जरिए किसी तरह छूट या नरमी लेने की कोशिश; यूरोपीय देशों को रूसी गैस में छूट का प्रावधान दिखाता है कि राजनीतिक अपवाद संभव हैं।








