CJP के प्रवक्ताओं और नेताओं, जैसे सौरव दास और अभिजीत दीपके, का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश सरकार के 25 जुलाई वाले आश्वासन के खिलाफ जा रहा है, क्योंकि इसमें मौजूदा FIR की जांच जारी रखने की अनुमति दी गई है।
इसी आधार पर CJP ने साफ कहा है कि अगर सरकार छात्रों पर दर्ज FIR को तय समय में रद्द नहीं करती और उन्हें पुलिस या प्रशासन के जरिए परेशान करना जारी रखती है, तो वे राष्ट्रव्यापी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को दोबारा शुरू करेंगे, यानी “फिर से सड़कों पर उतरेंगे।”
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर खास आपत्ति
CJP की प्रमुख आपत्ति निर्देश संख्या 4 जैसे प्रावधानों पर है, जिसके तहत सरकारों को मौजूदा FIR के साथ आगे बढ़ने और जांच जारी रखने की छूट दी गई है।
उनका तर्क है कि यह सरकार द्वारा छात्रों को दी गई लिखित/स्पष्ट गारंटी के खिलाफ है और राज्यों को बहाना मिल सकता है कि वे FIR वापस न लें, जबकि आंदोलन समाप्त करने की शर्त ही FIR वापसी और गैर-कार्रवाई की थी।
सरकार और राज्यों पर दबाव
CJP ने केंद्र के साथ-साथ NDA शासित राज्यों—खासकर बिहार, असम और कुछ अन्य राज्यों—से कहा है कि वे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR वापस लेकर केंद्र सरकार के आश्वासन का सम्मान करें।
साथ ही, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसी सरकारों पर भी दबाव बना है कि वे यह स्पष्ट करें कि छात्र आंदोलन से जुड़ी FIRs पर उनका अंतिम फैसला क्या होगा, क्योंकि CJP की चेतावनी के बाद इन राज्यों ने भी समीक्षा के संकेत दिए हैं।
राजनीतिक और कानूनी महत्व
यह प्रकरण आपके हित क्षेत्र—राजनीतिक जवाबदेही, युवा आंदोलनों और राज्य की पुलिस-सत्तात्मक शक्तियों की सीमाओं—का क्लासिक केस बनता जा रहा है।
एक तरफ सुप्रीम कोर्ट कानून की प्रक्रिया (investigation, evidence preservation, coercive action पर रोक) को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, दूसरी तरफ CJP इसे सरकार द्वारा किए गए राजनीतिक/नैतिक वादे की अवहेलना के रूप में देख रही है और इसे आधार बनाकर बड़े स्तर के आंदोलन की धमकी दे रही है।








