अमेरिका और यूरोप के कई बड़े शहरों में ‘No Kings’ नाम से आयोजित रैलियों में लाखों लोगों ने हिस्सा लेकर पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया। इन प्रदर्शनों का मुख्य उद्देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ आवाज उठाना बताया जा रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, United States के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन डीसी, लॉस एंजेलिस जैसे शहरों में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। इसी तरह Europe के लंदन, पेरिस और बर्लिन में भी हजारों प्रदर्शनकारियों ने ‘नो किंग्स’ के नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे किसी भी तरह की ‘तानाशाही प्रवृत्ति’ को स्वीकार नहीं करेंगे।
इन रैलियों में शामिल लोगों ने पोस्टर और बैनर के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर की। कई जगहों पर लोगों ने “Democracy, Not Monarchy” और “Power Belongs to the People” जैसे नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि ट्रंप की नीतियां और बयानबाजी लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ये रैलियां केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता को लेकर बढ़ती चिंता का संकेत हैं। कई सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने भी इन प्रदर्शनों का समर्थन किया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में जनता की भागीदारी और आवाज सबसे महत्वपूर्ण होती है।
हालांकि, ट्रंप समर्थकों ने इन रैलियों को ‘राजनीतिक एजेंडा’ करार दिया है। उनका कहना है कि इस तरह के प्रदर्शन देश की एकता को नुकसान पहुंचा सकते हैं और चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, ‘No Kings’ रैलियों ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिका और यूरोप में राजनीतिक माहौल काफी गर्म है। आने वाले समय में इस तरह के विरोध प्रदर्शन और तेज हो सकते हैं, जिससे वैश्विक राजनीति पर भी असर पड़ने की संभावना है।








