- मानवीय संबंधों का संवेदनशील चित्रण – कवयित्री श्रीमती पुष्पा पोरे के काव्य संग्रह ‘गोंदणवेल’ का ठाणे में उत्साहपूर्वक विमोचन।
ठाणे:
विभिन्न मानवीय संबंधों, सुख-दुख, प्रेम-विरह, प्रकृति और मन के भावों का संवेदनशील चित्रण करने वाली कवयित्री श्रीमती पुष्पा नंदकिशोर पोरे के काव्य संग्रह ‘गोंदणवेल’ का विमोचन समारोह हाल ही में एक उत्साहपूर्ण और साहित्यिक वातावरण में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. अनुपमा ताई उजगरे ने की। मुख्य अतिथि के रूप में अभिनेता सिद्धांत सरफरे, यशवंत हिराबाई त्र्यंबक पगारे, प्रो. डॉ. सुधाकर लहुपचांग और वरिष्ठ गजलकार बदीउज्जमा बिराजदार उपस्थित थे। उनकी उपस्थिति ने इस समारोह को विशेष साहित्यिक और सांस्कृतिक समृद्धि प्रदान की।
अपने विचार व्यक्त करते हुए कवयित्री श्रीमती पुष्पा पोरे ने कहा, “कविता जानबूझकर नहीं रची जाती; वह मन और अनुभवों से स्वतः स्फूर्त होकर उपजती है।” उन्होंने बताया कि आसपास घटने वाली घटनाएं, लोगों का स्वभाव, बदलती प्रकृति और मन की भावनाएं जब शब्दों का रूप धारण करती हैं, तब कविता का जन्म होता है।
इस अवसर पर उन्होंने संग्रह से प्रेम की भावना को व्यक्त करने वाली पंक्तियां — “मनातल्या गाभाऱ्यात तुझी उमटली काया…” (मन के गर्भगृह में तेरी छवि उभरी…) श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत कीं।
इस काव्य संग्रह की प्रस्तावना प्रतिभाताई सराफ ने लिखी है, जबकि एकनाथ आव्हाड ने पुस्तक का समर्थन/समीक्षात्मक परिचय (पाठराखण) लिखा है। कवयित्री ने अपनी साहित्यिक प्रेरणा और मार्गदर्शन के लिए पाचकवडे सर के योगदान का भी विशेष रूप से उल्लेख किया। पुस्तक का आकर्षक मुखपृष्ठ डॉ. विनय वसंतराव दांदळे ने तैयार किया है और इसके प्रकाशन की जिम्मेदारी शिकलगार ने संभाली है। ‘गजल गंधर्व’ सुधाकर कदम व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सके, लेकिन उन्होंने संदेश भेजकर समारोह को अपनी हार्दिक शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम का कुशल संचालन पल्लवीताई उमरे ने किया। कवयित्री ने अपनी साहित्यिक यात्रा में परिवार द्वारा दिए गए मजबूत समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “जब कविता पुस्तक का रूप ले लेती है, तो वह केवल कवि की नहीं रह जाती, बल्कि पाठकों की हो जाती है।” यह कहते हुए उन्होंने ‘गोंदणवेल’ काव्य संग्रह को सहृदय पाठकों को समर्पित किया।
दिग्गज साहित्यकारों, रसिक श्रोताओं और आमंत्रित अतिथियों की उत्साहपूर्ण उपस्थिति में संपन्न हुए इस विमोचन समारोह ने ‘गोंदणवेल’ की साहित्यिक यात्रा की एक बेहद अर्थपूर्ण और शानदार शुरुआत की है।








