आइजोल। मिजोरम में वर्ष 2017 में एक महिला के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म और एसिड अटैक के बहुचर्चित मामले में अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए दो निलंबित बीएसएफ जवानों को 42-42 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। लंबे समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद आए इस फैसले को महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों पर न्यायपालिका के कड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
आइजोल की अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने मामले की सुनवाई पूरी करने के बाद दोनों आरोपियों नीलांजन दास और दिनेश कुमार को दोषी ठहराया। अदालत ने पाया कि दोनों ने महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया और बाद में उस पर एसिड से हमला कर गंभीर शारीरिक और मानसिक क्षति पहुंचाई। उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और अन्य तथ्यों के आधार पर अदालत ने दोनों को विभिन्न धाराओं के तहत दोषी माना।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि महिलाओं के खिलाफ इस प्रकार के जघन्य अपराध समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं और ऐसे मामलों में नरमी की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती। इसी को ध्यान में रखते हुए दोषियों को सामूहिक दुष्कर्म के लिए 20 वर्ष की कठोर कैद, गंभीर शारीरिक क्षति पहुंचाने वाले अपराध के लिए 10 वर्ष तथा एसिड अटैक के लिए 12 वर्ष की सजा सुनाई गई। सभी सजाएं क्रमवार चलेंगी, जिससे कुल सजा 42 वर्ष की हो गई है।
इसके अतिरिक्त अदालत ने दोनों दोषियों पर 60-60 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। निर्धारित समय में जुर्माना जमा नहीं करने की स्थिति में अतिरिक्त कारावास का प्रावधान भी रखा गया है।
यह मामला वर्ष 2017 में सामने आया था, जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया था। घटना के बाद जांच एजेंसियों ने मामले की गहन जांच की और पर्याप्त सबूत जुटाने के बाद आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया गया। न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कई महत्वपूर्ण साक्ष्य और गवाहों के बयान अदालत के सामने प्रस्तुत किए गए, जिसके आधार पर यह फैसला सुनाया गया।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले का निपटारा नहीं है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने वालों के प्रति कानून पूरी सख्ती से कार्रवाई करेगा। उनका मानना है कि ऐसे फैसले भविष्य में अपराधियों के लिए निवारक साबित हो सकते हैं।
महिला अधिकारों से जुड़े सामाजिक संगठनों ने भी अदालत के निर्णय का स्वागत किया है। उनका कहना है कि पीड़ितों को समय पर न्याय मिलना उतना ही जरूरी है, जितना अपराधियों को कड़ी सजा मिलना। इससे समाज में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास मजबूत होता है और पीड़ितों को मानसिक संबल भी मिलता है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रोकथाम के लिए केवल कठोर कानून ही पर्याप्त नहीं हैं। समाज में जागरूकता, महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना और संवेदनशील सामाजिक वातावरण का निर्माण भी आवश्यक है। शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से ही ऐसे अपराधों को जड़ से कम किया जा सकता है।








