नोएडा: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी की घोषणा के बाद भी नोएडा के औद्योगिक इलाकों में मजदूरों का विरोध प्रदर्शन थमता नजर नहीं आ रहा है। मंगलवार को भी सेक्टर 80, 121, 60 और फेज-2 सहित कई क्षेत्रों में श्रमिकों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। कई स्थानों पर स्थिति तनावपूर्ण बनी रही, जिसके चलते प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े।
पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, अब तक सात मामलों में एफआईआर दर्ज की गई है और 300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। अधिकारियों का कहना है कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने हिंसक रुख अपनाते हुए आगजनी, पथराव और तोड़फोड़ की घटनाओं को अंजाम दिया, जिससे सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचा। हालात को नियंत्रण में रखने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
गौतम बुद्ध नगर की पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने बताया कि जांच के दौरान यह संकेत मिले हैं कि कुछ संगठित समूहों ने सुनियोजित तरीके से मजदूरों को उकसाया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर कई फर्जी अकाउंट बनाए गए, जिनके जरिए भ्रामक जानकारी फैलाकर प्रदर्शन को भड़काया गया। पुलिस इन अकाउंट्स और इनके पीछे के लोगों की पहचान करने में जुटी है, साथ ही फंडिंग के स्रोतों की भी जांच की जा रही है।
दूसरी ओर, प्रदर्शन कर रहे मजदूरों का कहना है कि सरकार द्वारा घोषित वेतन वृद्धि का उन्हें अब तक कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिला है। उनका आरोप है कि फैक्ट्री मालिकों ने नई वेतन दरों को लागू नहीं किया है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति जस की तस बनी हुई है। कई श्रमिकों का कहना है कि बढ़ती महंगाई के बीच वर्तमान वेतन में परिवार का गुजारा करना बेहद कठिन हो गया है।
नोएडा फेज-2 में काम करने वाले एक श्रमिक ने बताया कि उसे हर महीने करीब ₹13,000 वेतन मिलता है, जो महीने के शुरुआती दिनों में ही खत्म हो जाता है। उन्होंने कहा कि परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें ओवरटाइम करना पड़ता है, फिर भी आर्थिक दबाव कम नहीं होता। मजदूरों की मांग है कि न्यूनतम वेतन को बढ़ाकर कम से कम ₹20,000 प्रति माह किया जाए।
प्रशासन का कहना है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और शांति बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। अधिकारियों ने श्रमिकों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील की है और आश्वासन दिया है कि उनकी समस्याओं का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल वेतन वृद्धि का नहीं, बल्कि श्रमिकों की जीवन गुणवत्ता और रोजगार की स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। यदि समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर औद्योगिक उत्पादन और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।







