आगरा का ताजमहल एक बार फिर कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है। इस बार मामला ताजमहल परिसर को कथित ‘तेजो महालय’ मंदिर बताए जाने के दावे से जुड़ा है। इस संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की गई है, जिसमें परिसर का न्यायिक निगरानी में सर्वे कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सर्वे से विवाद से जुड़े तथ्यों को स्पष्ट करने में मदद मिलेगी, जबकि अंतिम फैसला अदालत को ही करना है।
कई वर्षों से लंबित है मुकदमा
ताजमहल परिसर को लेकर यह कानूनी विवाद नया नहीं है। इस विषय पर आगरा की सिविल अदालत में वर्ष 2015 से एक दीवानी मुकदमा लंबित है। याचिका में दावा किया गया है कि वर्तमान ताजमहल परिसर वास्तव में भगवान श्री अग्रेश्वर महादेव नागनाथेश्वर का प्राचीन मंदिर था, जिसे ‘तेजो महालय’ के नाम से जाना जाता है।
इसी मुकदमे के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत से परिसर का निरीक्षण कराने और इसके लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की मांग की थी। उनका तर्क था कि न्यायिक सर्वे से विवादित तथ्यों की निष्पक्ष जांच संभव हो सकेगी।
निचली अदालतों से नहीं मिली राहत
सर्वे की मांग सबसे पहले सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में रखी गई थी। अदालत ने इस प्रार्थना पत्र को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद मामले को अपील के रूप में अपर जिला न्यायाधीश के समक्ष ले जाया गया, लेकिन वहां भी सर्वे कराने की अनुमति नहीं मिली।
अब इन्हीं दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि बिना वैज्ञानिक और न्यायिक निरीक्षण के विवाद के सभी पहलुओं को समझना कठिन है।
हाईकोर्ट के सामने क्या है मुख्य सवाल?
हाईकोर्ट के समक्ष सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि क्या इस मामले में एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त कर परिसर का सर्वे कराया जाना आवश्यक है। अदालत पहले यह तय करेगी कि निचली अदालतों द्वारा सर्वे से इनकार करना उचित था या नहीं।
यदि अदालत सर्वे की अनुमति देती है, तो उसके लिए आगे की कानूनी प्रक्रिया तय की जाएगी। वहीं यदि याचिका खारिज होती है, तो निचली अदालतों का फैसला बरकरार रह सकता है।
ऐतिहासिक और कानूनी बहस साथ-साथ
ताजमहल को लेकर समय-समय पर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। अधिकांश इतिहासकार और पुरातत्व विशेषज्ञ ताजमहल को मुगल सम्राट शाहजहां द्वारा निर्मित मकबरा मानते हैं। वहीं कुछ संगठनों और व्यक्तियों का दावा है कि यह एक प्राचीन शिव मंदिर था।
इन परस्पर विरोधी दावों के बावजूद अब तक किसी सक्षम न्यायालय ने इस विषय पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इसलिए फिलहाल यह पूरा मामला न्यायिक विचाराधीन है।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों में अदालतें केवल दावों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध दस्तावेजों, साक्ष्यों और कानूनी प्रावधानों के आधार पर निर्णय लेती हैं। यदि किसी प्रकार का सर्वे कराया जाता है, तो उसका उद्देश्य केवल तथ्यों का परीक्षण होगा, न कि किसी दावे को स्वतः सही या गलत घोषित करना।
सोमवार की सुनवाई पर नजर
अब इस मामले में सभी की निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट की संभावित सोमवार की सुनवाई पर हैं। अदालत यह तय करेगी कि याचिका पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता है या नहीं और क्या विवादित परिसर के सर्वे के संबंध में कोई निर्देश जारी किया जाना चाहिए।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि ताजमहल को ‘तेजो महालय’ घोषित करने संबंधी कोई न्यायिक आदेश मौजूद नहीं है। हाईकोर्ट में दायर याचिका केवल सर्वे कराने की मांग से संबंधित है। मामले का अंतिम निष्कर्ष अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों, कानूनी तर्कों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही तय होगा। ऐसे में आने वाली सुनवाई इस लंबे समय से चल रहे विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।








