मध्य पूर्व संकट के बीच भारत ने बचाए अपने हित, ऊर्जा सुरक्षा से लेकर प्रवासी भारतीयों तक हर मोर्चे पर दिखाई सक्रियता

मध्य पूर्व में लंबे समय तक चले तनाव और सैन्य टकराव के दौरान भारत ने जिस परिपक्व कूटनीतिक रणनीति का प्रदर्शन किया, उसने वैश्विक स्तर पर देश की भूमिका को और मजबूत किया है। क्षेत्र में बढ़ते संघर्ष के बीच भारत ने न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक गतिविधियों और लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट भारत की विदेश नीति के लिए एक बड़ी परीक्षा था, जिसमें देश ने संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाकर अपने हितों को सुरक्षित रखा।

मध्य पूर्व भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत अपनी तेल और गैस की जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और अन्य खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। इन प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली धनराशि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर भारत पर पड़ सकता था।

जब क्षेत्र में संघर्ष बढ़ा और समुद्री मार्गों पर खतरे की आशंका पैदा हुई, तब भारत ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए कई स्तरों पर सक्रियता दिखाई। विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास लगातार स्थानीय प्रशासन और संबंधित देशों के संपर्क में रहे। भारतीय नागरिकों को सुरक्षा संबंधी सलाह जारी की गई और जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध कराने की तैयारियां भी की गईं।

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने किसी भी पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय शांति और संवाद का पक्ष लिया। भारत ने लगातार कहा कि विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीतिक प्रयासों से होना चाहिए। यही नीति भारत को क्षेत्र के विभिन्न देशों के साथ सकारात्मक संबंध बनाए रखने में मदद करती रही।

भारत के इजराइल, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों के साथ अलग-अलग रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। इन सभी देशों के साथ संतुलन बनाए रखना किसी भी देश के लिए आसान नहीं माना जाता। लेकिन भारत ने अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसी नीति अपनाई, जिससे किसी भी महत्वपूर्ण साझेदारी पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।

ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत ने दूरदर्शिता दिखाई। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति बाधित होने की आशंकाओं के बीच भारत ने वैकल्पिक स्रोतों और रणनीतिक भंडारों पर भी ध्यान केंद्रित किया। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत ऊर्जा आयात के स्रोतों में और अधिक विविधता लाने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है ताकि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम की जा सके।

इस संकट ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों के महत्व को भी उजागर किया। समुद्री मार्गों में व्यवधान की संभावना ने भारत को वैकल्पिक कनेक्टिविटी परियोजनाओं और नए व्यापार गलियारों की आवश्यकता का एहसास कराया है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में भारत ऐसे बुनियादी ढांचा और परिवहन प्रोजेक्ट्स को अधिक प्राथमिकता दे सकता है, जो व्यापार को सुरक्षित और निर्बाध बनाए रखने में मदद करें।

विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। इसका अर्थ यह है कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर निर्णय लेता है और किसी भी वैश्विक शक्ति के दबाव में अपनी नीति तय नहीं करता। यही कारण है कि विभिन्न देशों के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद भारत संवाद और सहयोग के लिए एक भरोसेमंद साझेदार बना हुआ है।

Star CG News 24
Author: Star CG News 24

Rajendra Dhote

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