नरेंद्र मोदी आज असम में चुनावी प्रचार को धार देने के लिए तीन महत्वपूर्ण रैलियों को संबोधित करेंगे। राज्य में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक गतिविधियां अपने चरम पर पहुंच गई हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह दौरा भारतीय जनता पार्टी के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री की पहली रैली निचले असम के बारपेटा जिले के भबानीपुर-सोरभोग क्षेत्र में होगी। यहां वे भाजपा के वरिष्ठ नेता और उम्मीदवार रंजीत कुमार दास के समर्थन में जनता से वोट की अपील करेंगे। यह इलाका राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है और यहां बड़ी संख्या में मतदाता मौजूद हैं।
इसके बाद प्रधानमंत्री मध्य असम के होजई में दूसरी जनसभा को संबोधित करेंगे। इस रैली में वे भाजपा उम्मीदवार शिलादित्य देव के पक्ष में प्रचार करेंगे। होजई क्षेत्र में भाजपा और विपक्ष के बीच कड़ी टक्कर मानी जा रही है, ऐसे में प्रधानमंत्री की यह सभा चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
दिन की अंतिम और तीसरी रैली ऊपरी असम के डिब्रूगढ़ में आयोजित की जाएगी। यहां नरेंद्र मोदी राज्य मंत्री प्रसांता फुकन के समर्थन में जनता को संबोधित करेंगे। डिब्रूगढ़ को भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, और यहां की रैली पार्टी के लिए मनोबल बढ़ाने वाली साबित हो सकती है।
यह इस चुनावी सीजन में प्रधानमंत्री का असम का दूसरा दौरा है। इससे पहले वे 1 अप्रैल को भी राज्य में चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे थे। उस दौरान उन्होंने गोगामुख और बेहाली में जनसभाएं की थीं और डिब्रूगढ़ में चाय बागान की महिला श्रमिकों से मुलाकात कर संवाद भी किया था। इस तरह प्रधानमंत्री लगातार जमीनी स्तर पर मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी इस बार असम में अपनी स्थिति को और मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। पार्टी विकास, बुनियादी ढांचे, रोजगार और सामाजिक कल्याण योजनाओं जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रही है। प्रधानमंत्री की रैलियों के जरिए इन मुद्दों को बड़े स्तर पर जनता तक पहुंचाने की रणनीति बनाई गई है।
असम में कुल 126 विधानसभा सीटों के लिए मतदान 9 अप्रैल को होगा, जबकि मतगणना 4 मई को निर्धारित है। चुनाव प्रचार 7 अप्रैल को समाप्त हो जाएगा, ऐसे में अंतिम दिनों में सभी दलों ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री की रैलियां भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। उनके भाषणों का असर सीधे मतदाताओं पर पड़ता है और इससे चुनावी रुझानों में बदलाव भी संभव है।








