यह खबर सही दिशा में है: महाराष्ट्र की जेलों में अति-भीड़ गंभीर स्तर पर पहुंच चुकी है और इसकी पुष्टि बॉम्बे हाई कोर्ट में दाखिल जेल विभाग के हलफनामे से होती है।
मुख्य आंकड़े
राज्य की 60 जेलों में अप्रैल 2026 तक निर्धारित क्षमता से लगभग 38,515 कैदी अधिक थे।
कुल भीड़ क्षमता के लगभग 140% से अधिक बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार करीब 83% बंदी विचाराधीन (undertrial) हैं, यानी अदालत में दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
महाराष्ट्र कारागृह विभाग ने अपनी सार्वजनिक सांख्यिकी में भी मार्च और अप्रैल 2026 के जेल-जनसंख्या आंकड़े प्रकाशित किए हैं।
क्यों गंभीर है स्थिति
विचाराधीन कैदियों की इतनी बड़ी हिस्सेदारी यह दर्शाती है कि समस्या केवल जेल-क्षमता की नहीं, बल्कि मुकदमों की लंबितपन, जमानत प्रक्रिया, विधिक सहायता और निचली अदालतों की कार्यवाही की गति से भी जुड़ी है।
मुंबई, ठाणे और महाराष्ट्र के अन्य बड़े शहरों की जेलों में भीड़ पहले से चिंताजनक बताई जा रही थी; कुछ प्रमुख जेलों में यह 150%–200% तक पहुंचने की रिपोर्टें आ चुकी हैं।
प्रशासनिक असर
अति-भीड़ से सबसे पहले दबाव इन क्षेत्रों पर पड़ता है:
भोजन, पानी, स्वच्छता और निवास स्थान की उपलब्धता
चिकित्सा सुविधा और संक्रामक रोगों का जोखिम
जेल सुरक्षा, हिंसा तथा अफरातफर का खतरा
कैदियों की पुनर्वास, शिक्षा और कौशल-गतिविधियां
इसलिए यह केवल “जेल में जगह कम” का मुद्दा नहीं है; यह न्याय प्रणाली, जेल सुधार और बंदियों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा गवर्नेंस मुद्दा है।
संभावित उपाय
छोटे अपराधों और लंबे समय से विचाराधीन बंदियों के लिए तेज जमानत/प्रोबेशन समीक्षा
विधिक सहायता क्लिनिक और जिला लीगल सर्विसेज अथॉरिटी की सक्रिय भूमिका
नई जेलों/अतिरिक्त बैरकों की योजना, साथ ही मौजूदा जेलों का विस्तार
Open/semi-open prisons और non-custodial alternatives का विस्तार
मुकदमों की प्राथमिकता वाली सुनवाई, विशेषकर जिनमें बंदी लंबे समय से जेल में हैं
संक्षेप में: यह खबर विश्वसनीय है और इसका सबसे बड़ा संदेश यह है कि महाराष्ट्र में जेल भीड़ की जड़ में विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति है।








