दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 20 रुपये के नकली सिक्के बनाने और बाजार में सप्लाई करने वाले गिरोह का भंडाफोड़ किया है। मुंडका इंडस्ट्रियल एरिया मेट्रो स्टेशन के पास एक कार से 5,000 नकली सिक्के बरामद हुए, जिनकी फेस वैल्यू करीब ₹1 लाख थी।
पुलिस की कार्रवाई
8 सितंबर को मिली गुप्त सूचना के आधार पर क्राइम ब्रांच ने पारस जैन (45) की टोयोटा इटियोस को रोका।
कार की पिछली सीट पर रखे लैपटॉप बैग में 50 पॉलीथीन पाउच मिले; हर पाउच में 100 नकली सिक्के थे, कुल 5,000 सिक्के।
पारस जैन को मौके पर गिरफ्तार किया गया; बाद में कथित निर्माता/सरगना उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप सिंह, अनुराग पाल उर्फ लंकेश और जनार्दन कुमार चौरसिया उर्फ संतोष को भी गिरफ्तार किया गया।
पुलिस ने नकली सिक्कों के अलावा कार, आईफोन और लैपटॉप बैग भी जब्त किया।
कैसे चल रहा था नेटवर्क
पूछताछ में पारस जैन ने बताया कि वह नकली सिक्के उपकार लूथरा से लेता था। लूथरा कथित तौर पर ₹1 लाख फेस वैल्यू के सिक्के करीब ₹70,000 में सप्लाई करता था, ताकि उन्हें बाजार में चलाया जा सके।
जांच में सामने आया कि लूथरा सोनीपत में फैक्ट्री चला रहा था और पुलिस की कार्रवाई के डर से उसे सहारनपुर शिफ्ट कर रहा था; वहां सहारनपुर पुलिस की SOG ने उसे साथियों समेत पकड़ा।
कानूनी कार्रवाई
क्राइम ब्रांच थाने में मामला दर्ज किया गया है और आरोपियों को भारतीय न्याय संहिता की धाराओं 179, 180, 61(2) और 3(5) के तहत गिरफ्तार किया गया है। चारों आरोपी अभी न्यायिक हिरासत में हैं और पुलिस नेटवर्क के अन्य सदस्यों की तलाश कर रही है।
बड़ा दावा
पकड़े गए आरोपियों ने पुलिस को बताया कि उनका नेटवर्क अब तक बाजार में करीब ₹70 करोड़ के नकली 20 रुपये के सिक्के चला चुका है; यह अभी पुलिस की जांच/आरोपियों के दावे पर आधारित है, अंतिम न्यायिक पुष्टि नहीं।
यह गिरोह मुख्य रूप से हरियाणा के सोनीपत में नकली ₹20 के सिक्के बनाता था, जिसे दिल्ली पुलिस की कार्रवाई के बाद सहारनपुर शिफ्ट करने की कोशिश की जा रही थी। पुलिस ने वहां छह भारी मशीनें, लोहे के सांचे और नकली सिक्के बरामद किए।
फैक्ट्री कहाँ थी?
उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप सिंह के नेटवर्क ने करीब 10 महीने सोनीपत में यह इकाई चलाई; उसे स्क्रूड्राइवर बनाने के कारोबार के रूप में छिपाया गया था।
पारस जैन की गिरफ्तारी के बाद लूथरा मशीनरी सोनीपत से सहारनपुर ले जा रहा था, जहां सहारनपुर पुलिस की SOG ने उसे पकड़ लिया।
सहारनपुर में पुलिस ने 6,400 नकली सिक्के (₹1.28 लाख फेस वैल्यू), लगभग ₹5 लाख के अधूरे सिक्के और छह भारी मशीनें जब्त कीं।
सिक्के कैसे बनते थे?
पुलिस के अनुसार गिरोह ने तीन-चरण की प्रक्रिया अपनाई थी:
कच्ची रिंग खरीदना: दिल्ली की एक यूनिट से एल्युमिनियम, तांबा और निकल के मिश्रण से बने, सिक्के के आकार के खाली रिंग मंगाए जाते थे।
नकली डाई/सांचा बनवाना: दिल्ली की दूसरी यूनिट से असली ₹20 सिक्के जैसे डाई विशेष रूप से बनवाए जाते थे।
प्रेस और फिनिशिंग: रिंग पर डाई दबाया जाता था, फिर मशीनों से सिक्कों को गोलाई, चमक और फिनिश दी जाती थी ताकि वे असली लगें।
उत्पादन और कमाई
आरोपियों ने पुलिस को बताया कि वे रोजाना 10,000–12,000 नकली सिक्के बना सकते थे और हर सिक्के की लागत लगभग ₹5–6 थी। लूथरा ने पारस जैन को ₹1 लाख फेस वैल्यू के सिक्के करीब ₹70,000 में दिए थे; यानी नकली सिक्के बनाकर उन्हें बाजार में चलाने का पूरा सप्लाई-चेन बना हुआ था।
भूमिका का बंटवारा
पुलिस के मुताबिक उपकार लूथरा सिक्कों की फिनिशिंग और नेटवर्क का मुख्य हिस्सा संभालता था; अनुराग पाल फैक्ट्री संचालन, जनार्दन चौरसिया निर्माण, जबकि हिमांशु और कुलदीप वितरण का काम देखते थे। पारस जैन की भूमिका सिक्कों की खेप लेकर दिल्ली में बाजार तक पहुंचाने की थी।








